विजयी भव
मेरी मंज़िल को भी नहीं भनक
तय हुआ कैसे रास्ता ,वहाँ पहुँचने तक
गुमराह किया ,मज़ाक़ ‘हालातों’ का उड़ाया
बिना बुलाए बहुतो ने,वक़्त-बेवक्त आकर ।
ख़ुश तो बहुत हुए होंगे, उजाड़ कर हमें
खुश तो हम भी हुए ,उनकी असलियत जानकर
मुश्किल हो सकता है ,ख़ुद को फिर से खड़ा करना
पर बांध ली है मज़बूत रस्सी, उम्मीदों की खींचकर ।
बुलंद होते जाएँगे अब तो हौसले
रुकने तो देंगे ही नहीं अब
मंज़िल भी अपनी, सफ़र भी अपना
फिर थक जायगी, तक़दीर भी रूठकर ।
दे देते हैं ख़ुद को ही ‘शुभकामनाएं’
“विजयी भव” ,अब नहीं हटना पीछे
साँस सुकून की लेनी है बस अब
आख़िरी पड़ाव पहुँचकर ।।
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