दिवार की ओट

देखे जा रही दीवार के पीछे से, ख़ुद को छिपाकर

 कुछ डरी हुई, कुछ सहमी हुई सी,

 बेचैनी भरी हुई थीं आँखों में , उदासी ठहरी हुई थी चेहरे पर

 उम्मीद थी मुझसे बेशक, ताकें जा रही थी रुक रुककर ।


दीवार की ओट लेकर ही समझा रही थी

 अपने चेहरे से कोई कहानी बयां भी कर रही थी ,

एक पैर भी नहीं सरका रही ,जैसे’ गढ़ गए थे’ ज़मीन पर 

बिना बोले ही अपने सवालों के जवाब भी चाह रही थी ।

 छुपीं हुई सी आशा थी उसकी आँखों में ,

बोहोत कुछ चाहती होगी कहना,आगे बढ़कर 

                         शायद परिस्थितियों रोक रही थी ।

मुस्कुराईं मैं भी हल्के से,कर दूँ थोड़ा निश्चिंत 

बढ़ा रही हूँ हाथ मदद के लिए, दे दूँ थोड़ी सी हिम्मत ,

 “दीवार की ओट” से ही ताकती रही ,वो मासूम ठिठककर,

पर,आई तो सही मुस्कुराहट थोड़ी सी , 

                        उस मायूस चेहरे पर,उन बेजान लबों पर  ।।

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