जादू सी झलक
तरस जाते हैं लबों पर मुस्कान लाने के लिए
ढूंढते हैं नए नए बहाने मन रिझाने के लिए
वजह तलाशते है ‘ज़बर्दस्ती’ खिलखिलाने की
परेशान कर लेते हैं ख़ुद को ही
हल्की सी झलक पाने के लिए ।
झलक ‘मुस्कुराहट की झलक ‘
उन चमकती हुई आँखों में दिखी
टपकता पसीना ,आत्म विश्वास भरे चेहरे में दिखी
थक हार कर भी खिलखिलाते हुए ,
हाथ पर ही रोटी चटनी खाते हुए में दिखी
जो मिला उसी में रह-रहे संतुष्ट में दिखी
चेहरे पर बढ़ती झुर्रियां ना रिश्तेदार ना साथी ,
दूसरों को ख़ुश देखकर ख़ुश रहने वालों में दिखी
उस बेख़ौफ़ बेपरवाह बचपन में दिखी
अपने ‘काम से काम’ रखने वाले लोगों में दिखी ।
जिसको ढूंढ रहे बाहर भटक भटककर
महसूस किया मन को थोड़ा शांत करके
बिना विचलित हुए अंतर्मन में ,टटोला ख़ुद को
मुस्कुराहट की वही चुलबुली,करिश्माई
“जादू सी झलक” अपने भीतर भी दिखी ।।
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