आँखें माँ की

अपनी उम्मीदों की गठरी को बाँध कर 

बच्चों की खुशियों को बना कर मक़सद 

            हिम्मत करके तय कर गई लम्बा सफ़र ।

“सपने”  सजाये हुए हैं माँ की आँखें ने 

मुड़ी-तुडी पर्ची पर ,लिखे है ढेर सारे 

 कुछ हो गए पूरे, कुछ अभी बाक़ी है

रूके न कुछ भी ,आये ना कोई अड़चन

                 बस चलता रहे यूँ ही सब उम्र-भर ।

बना रही है सपनों को गूँथके लड़ियाँ 

कोई छोटी ,कोई बड़ी भी है उनमें 

पर गाँठ मज़बूत लगी है सबमें 

         खुल ना जाए कभी,नज़रें टीकी है उन्हीं पर ।

कुछ अलग सी, चमक रही है “आँखे माँ की”

प्यार और विश्वास दोनों ही लबालब है इनमें 

           उमड़ रही हैं दुआएँ उनमें झोली भर-भरकर  ।।

           

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े