आँखें माँ की
अपनी उम्मीदों की गठरी को बाँध कर
बच्चों की खुशियों को बना कर मक़सद
हिम्मत करके तय कर गई लम्बा सफ़र ।
“सपने” सजाये हुए हैं माँ की आँखें ने
मुड़ी-तुडी पर्ची पर ,लिखे है ढेर सारे
कुछ हो गए पूरे, कुछ अभी बाक़ी है
रूके न कुछ भी ,आये ना कोई अड़चन
बस चलता रहे यूँ ही सब उम्र-भर ।
बना रही है सपनों को गूँथके लड़ियाँ
कोई छोटी ,कोई बड़ी भी है उनमें
पर गाँठ मज़बूत लगी है सबमें
खुल ना जाए कभी,नज़रें टीकी है उन्हीं पर ।
कुछ अलग सी, चमक रही है “आँखे माँ की”
प्यार और विश्वास दोनों ही लबालब है इनमें
उमड़ रही हैं दुआएँ उनमें झोली भर-भरकर ।।
Beautiful beautiful beautiful
ReplyDeleteHats off
Excellent 👍👍
ReplyDelete👍👍
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