सीने से लगाकर
पानी ‘आँखों में’ दिखते ही,
चेहरा ही घुमा लिया
दहलीज़ पार करते-करते ख़ुद को समझा लिया,
एक बसेरा था ये कुछ सालों के लिए
‘ढूंढ दिया’ है अब नया,
सोचकर, आगे कदम बढ़ा दिया ।
दिल हल्का किया है
सीने से लगाकर परिवार ने,
‘बरसती हुई आँखों ने’समझा दिये
रीति-रिवाज भी सलीक़े से ,
चली जा रही है, वो भर कर पिटारा
अपनी अठखेलियों का ,रुसवाई ,मनाई का
और छोड़ें जा रही है, गुलिस्ताँ अपनी यादों का ।
हो सकता है वो ‘महल बड़ा हो’ इस घर से
घर में रहने वाले भी मिल जाए ‘अपने से’,
नया नहीं है कुछ भी-
चल ही रहा है ये, इस जहां में ‘सदियों से’ ।
ख़्वाहिश यही बस-
रच बस जाएं, जाकर नए संसार में ,
‘काश’ मिल जाएं वहाँ भी, “सीने से लगाकर”
अपनेपन का एहसास करवाने वाले,
नये घर-परिवार में ।।
So heart touching
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