मन का ग़ुबार

 मन का ग़ुबार 

नहीं देखा निकलते, सरेआम बेक़ाबू होते ,

पता नहीं  कितने ही, राज है उसके सीने में ।

है तो इन्सान ही पर-

 वह  तो स्तम्भ है घर का ,

नहीं है ‘इजाज़त छलकने की’ उन्हें 

 जो समुंदर भरा है उसकी आँखों में ।


बहुत बार चलें होंगे 

बेताब लफ़्ज़,  होंठों से निकलने को,

नहीं कहा खुलकर ,अपना हाल कहीं बैठकर ।

 उमड़े भी होंगे बार-बार, जज़्बात दिल के,

 बाँटने को किसी ‘अपने के साथ’,

     खुलकर गले लग-कर ।


एक मुस्कुराहट से 

पूरा घर हँसता है उसकी,

नींव है वह घर की तो-

डगमगाने की गुंजाइश ही नहीं ।

बेबसी कहें या ज़िम्मेदारी ,रखना ही है रोककर,

“मन का ग़ुबार” दफ़नता आ रहा है

  और दफनता ही रहेगा , 

   यूँ ही  दिल के ही भीतर  ।।

                 

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