मौसम की अदा
दिन निकलते ही, था कुछ अलग-अलग सा
गरजते बरसते आसमाँ ने ‘रंग जमा दिया’,
दरख़्तों के तने डूब गए गहरे पानी में
आज बादलों ने, सारा ध्यान यहीं लगा दिया ।
घुटने तक उठाकर कपड़े, उतरे गहरे पानी में
कभी गिरते, कभी उठते, मचलते हुए ,
खिलखिलाते हुए उस दरिया में दौड़ते रहे ,
देखते-देखते तैरकर गई चप्पल भी दूर तक
होते रहे लोट-पोट उसको जाती देखकर ।
टहनियों से निकलती, छोटी छोटी पत्तियाँ
जड़ों से बाहर निकले ,कुछ नए पौधे,
महसूस करते हुए अपनी पहली बारिश को
नहा रहे थे जैसे, बूंदों में ‘मदहोश से होकर’ ।
मोरों ने नाच-नाचकर
बादलों को कुछ ऐसे रिझाया
होकर मजबूर बदलना ही पड़ा, अपना रूख,
दिल है प्रफुल्लित, देख “मौसम की अदा”
लग रहा है अब, सब बदला बदला सा ।।
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