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पांए-पाएं की उम्मीद

                    अभी कुछ दिनों से  दिमाग़ एक अलग ही दिशा में सोच रहा था । “एक छोटी सी फ़ोन की घंटी साइरन का काम कर रही थी” ।         जब फ़ोन की घंटी बजती है तो भागकर हाथ जाता है ।  कभी कट ना जाए ।        “ऐसा मेरे साथ ही नहीं  बल्कि बहुतों के साथ यही होता होगा” ।                     फिर से छोटे बच्चे के  जैसे खड़े हो रहे है । बच्चों के  जैसे ही उनको संभाल भी रहे है  । कोशिश करते हैं चलने की लेकिन थक जाते हैं ।    “बैठने की कोशिश की नहीं करते बल्कि इशारा करके कुर्सी पर बैठ ही जाते हैं” ।               “ जैसे बच्चा एक-दो क़दम रखते ही धक्के से बैठ जाता है और गुडलिए चलना शुरू कर देता हैं” ।   ...