फिर अगले बरस
बहुत रौनक़ और ख़ुशनुमा माहौल रहा
सब के मन में उत्साह और शरीर में जोश रहा
बिना थके ही पूरा-पूरा दिन झूमते ही रहे
शायद ‘आशीर्वाद था माँ का’ सब पे
दर्द भी इसलिए ही ख़ामोश रहा ।
ना चाहते हुए भी थिरकते रहे क़दम
ना छोटे बड़े ना ही जाति-पाति का कोई वहम
सब एक जैसे ही थे पंडाल के अंदर,
गरीमा थी शायद उन पवित्र हवाओं की
रम से गए थे सभी ,
थी ‘अद्भुत शक्ति’ उन्हीं झोंकों की ।
क्या अब से ना कोई झंकार होगी ?
ना तालियों की आवाज़ और ‘ढोल की थाप’ होगी
‘मॉं’ पंडाल ख़ाली करके चली है हमारा
अब तो “फिर अगले बरस” पर ही आस होगी ।।
🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼
Shi bole ho
ReplyDeleteAdbhut rachna
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