बंदोबस्त

                  दिनेश और कला ने “अपने लिए शायद कभी कुछ नहीं सोचा” ।बस बेटे का ही सोचा । उन्हें अपने ख़र्चे की तो  ज़्यादा चिंता भी नहीं थी ।

     “सब दिनेश की  पेंशन से हो जाता था” । 

             फिर एक दिन, विदेश गए बेटे ने बोल दिया - “नौकरी करने का दिल नहीं है उसका” । अब उसे बिज़नस शुरू करना है । उसके   लिए पैसे चाहिए।  

          पर उनके बेटे को ये दिखाई नहीं दे रहा था । “माँ बाप ने तो सारी कमाई ही उसके ऊपर  लगा दी” । अब कहाँ से लायेंगे ?

         “वह जब भी फ़ोन करता , घूमा-फिराकर पैसे की ही माँग करता” । 

             अब उनके बेटे की सुई, आकर मकान और ज़मीन पर टिक गई थी । बार-बार  अपने पिता को बोलता रहता। 

    “आप दो जनों  को इतने बड़े घर का क्या करना है” । 

           मेरे बिना उस ज़मीन का भी आगे जाकर क्या करोगे । इसलिए इनको बेच दो ।  

         “धीरे-धीरे  दिनेश की भी यही सोच बन गयी थी” । हमारी तो उम्र निकल रही है । उसके अभी तरक़्क़ी करने के दिन है ।

        कला कभी-कभी विरोध करती । दिनेश को समझाने की कोशिश भी  करती । पर मन मार कर बैठ जाती थी । 

         उसकी चलनी तो नहीं थी । “क्योंकि दिनेश पूरी तरह से पुत्रमोह  में फँसा हुआ था” । 

           जैसे-जैसे  बेटा बोलता, वह बिलकुल वैसे ही करने को तैयार हो जाता । “फिर एक दिन मजबूर होकर फ़ैसला कर ही लिया” ।

                  ज़मीन और मकान दोनों  बेच दिये । ख़ुद के लिए दो कमरों का घर ले लिया । “बचें सारे पैसे  बेटे के पास भेज दिये”।  

            पैसे भेजने के बाद बहुत दिनों तक बेटे का कोई फ़ोन नहीं आया ।

             “ दिनेश और कला  जब भी फ़ोन करते । बेटा यही बोलता —अभी करता हूँ । शाम को करता हूँ”। 

          दोनो यही सोचते  । जब समय लगेगा तो अपने आप कर लेगा ।

            “धीरे-धीरे इन लोगों ने भी अपने आपको  धर्म संस्था से जोड  लिया” ।  उनके साथ सुबह-शाम व्यस्त रहने लगे । 

         फिर अचानक - एक दिन गली के चौकीदार ने साथ वाले पड़ोसी को  बहार बुलाकर पूछा —“कि साहब जी और  उनकी पत्नी को काफ़ी दिनों से नहीं देखा” । 

     वह भी बेटे के पास विदेश चले गए क्या ? 

                 उस पड़ोसी ने दो-तीन पड़ोसियों को बुलाया ।  “दरवाज़े को हिला कर देखा तो दरवाज़ा अंदर से बंद था” ।

         खटखटाया तो कोई नहीं आया ।  सबने मिलकर सलाह करके,  पुलिस को बुला लिया ।  पुलिस के आने पर दरवाज़ा तोड़ दिया गया । 

         घर की हालात देखकर सब लोग हैरान हो गए । “दोनों पति- पत्नी मंदिर के आगे लेटे हुए थे । जैसे सो रहे हो ।  हिलाने- डुलाने से भी नहीं उठे” । 

        भाग कर किसी ने  डॉक्टर को बुलाया । डॉक्टर ने दोनों को जाँचने के बाद सबको बताया ।

       “दोनों ही दुनिया से जा चुके हैं।” 

             सबकी आँखों में पानी आ गया ।  पास पड़े हुए दिनेश के फ़ोन से,  बेटे का नम्बर निकाल कर उसको फ़ोन किया ।

      “उसने बोला—कोशिश करता हूँ आने की” । और फ़ोन कट गया ।

                 फिर पुलिस ने   बार-बार मिलाये गए नंबर निकालकर  लोगों को फ़ोन किये । सुबह निकलने तक सब धीरे धीरे जमा हो गए । 

           “किसी ने जानने की कोशिश नहीं की कि दोनों का देहान्त कैसे हुआ” ।  बस दाह-संस्कार जल्दी करने पर ज़ोर डालते रहे । 

           दाह संस्कार करते ही  सब वापस एक-एक करके चले गये ।    पड़ोसी  भी छोटी-मोटी औपचारिकता निभाकर  अपने-अपने घर चले गए ।  

          पुलिस ने सारे घर की तलाशी ली । कोई सबूत वग़ैरह मिले तो । “दोनों का एक साथ ही देहांत कैसे हो सकता है” ?

                बैंक के कुछ पेपर भी मिले । “मरने से थोड़े दिन पहले  ही अपनी बची हुई सेविंग्स और यह घर भी बेटे के नाम कर दिया” ।

       अपनी ज़िंदगी तो कभी जी ही नहीं पाए । “मरते-मरते भी बेटे के भविष्य के लिए बंदोबस्त कर दुनिया छोड़ गए” ।।





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