उनकी असली ज़रूरत
कबूतरों का समुह, उड-उड़कर बार- बार बालकनी में बैठ रहा था । “एक चक्कर खुले आसमान की तरफ़ लगा कर आते” और फिर से, वहीं बैठ जाते ।
“कभी नल के नीचे तो कभी मुंडेर पर” ।
तभी नीचे से कुछ धीरे से कुरेदने की आवाज़ सुनाई दी । झुक कर देखा तो , ‘दीवार के कोने की ओट में’ एक कबूतर का जोड़ा था ।
“जो चोंच मार-मारकर गमले की मिट्टी कुरेद रहा था” । और गोल-गोल घूम कर, भाग कर फिर से मुंडेर पर चढ़ जाता । “कुछ तो ढूँढ रहे थे”।
जैसे बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो उनके लिए ।
तभी थोड़ा सा पानी, नल चलाते समय बहकर एक जगह रुक सा गया । मैं कुछ काम से, मुड़कर पीछे हटी ही थी कि “सारे कबूतर एक -एक करके उस पानी के चारों ओर इकट्ठा हो गए” ।
कुछ ही समय में सारा पानी सूख गया । या यूँ कहें कि “प्यासे परिंदों ने सारा पानी झट से पी लिया था” ।
तभी मैं वापस मुड़कर गई । और फिर बहुत सारा पानी भरकर बर्तन में रख दिया ।
“मगर मुझ से डरकर कोई भी वापस नहीं आ रहा था” । बार बार झुककर देखती रही । और धीरे धीरे क़दम रख कर, बिना शोर किये दूर जाकर बैठ गई ।
“ मुड़ मुड़कर फिर भी देखती रही उन प्यासे जीवों को” ।
कल तक जिनको मैं भगा रही थी । बालकनी गंदी करते है , सामान को ख़राब कर रहे है । कैसे “आज उनका बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी” ।
फिर उनको भूलकर तैयार होने लगी, ऑफिस जाने के लिए ।
अचानक, फिर बर्तन पर नज़र गयी तो “ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं था” । मैं सचमुच में हँस रही थी ।
“आँखों से पानी निकल रहा था” । मैं ख़ुशी से झूम उठी ।
पानी के बर्तन के चारों तरफ़ कबूतर पानी पी रहे थे । बेफिक्र होकर । “एक कबूतर तो बर्तन के बीच में बैठा था” ।
उनके पास जाने पर भी वो नहीं डरे । “देर तो लगी मुझे समझने में” । पर “उनकी असली ज़रूरत” समझ आ गई ।
“क्यों हर रोज़ पानी के नल के नीचे घूमते रहते थे “।
रुके हुए पानी को पीकर जाते थे । और “गमलों को कुरेदकर मिट्टी में पानी ढूँढते थे” । संतुष्टि सी मिली , उनको पानी पीते देखकर ।
उसी समय सोच लिया, अब से उनको पानी के लिए कभी तरसना नहीं पड़ेगा ।।
Nature friendly 👍
ReplyDeleteRight 👍
ReplyDelete👍
ReplyDeleteNice 👍👌
ReplyDeleteBeautiful creation
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