सावन की वो पींग

महसूस ही नहीं हुआ ‘कब बड़े हो गए’ 

भाग-भागकर गलियों में खेलते खेलते

बिना छतरी के ही बारिश में घूमते-फिरते ।


‘झूले के पेड़’ के लिये 

चक्कर लगता था, पूरी मण्डली का

घूम-घूमकर ,छाँटकर देखा जाता ,

सबसे ऊँचा दिखता हो 

हो जो हरेभरे पत्तों से लदा हुआ ,

मोटी रस्सी डालने के लिए 

मोटी टहनी और मज़बूत तना ।


याद आता है अब भी

 ज़ोर-ज़ोर से खूब ऊँचे तक ‘पींगना’

कभी सीधी तो कभी टेडी होकर 

पतली रस्सियों से खींच-खींचकर

 पिंग का ‘गोल गोल’ घुमते ही रहना ।


 टपकती हुई बूँदे पत्तों से, फिर से 

 ‘पींग और गीत’ याद दिला रही है 

 पीछे छूट गई “सावन की वो पींग ” 

जिसको,रूह मेरी अब भी पुकार रही है ।।

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