मनोबल

 आसमाँ छूती इमारत ने, 

मनोबल कुछ ऐसे बढ़ाया

 सोच ऊँची, ख़्वाब ऊँचे,पर-

मन पर मज़बूत  ‘पकड़ ख़ुद की’,

झुकना मत, ‘बिना गलती के’ 

बनाए रखना  आत्मविश्वास को अपना साया,

 चलते रहते है बहुत इम्तिहान,  हर रोज़ ही,

झिझकना नहीं, फिसलना नहीं 

मुट्ठी में रखना संतुलन,  अपने तन-मन का ।


रचा हुआ  ‘विधी का विधान’

नहीं बदल पाया कोई भी,  आज तक

करके भरोसा ख़ुद पर, बस बढ़ता जा

वक़्त का क्या, ये तो बदलता है क़दम क़दम पर ।


हो सकता है-

दुआओं और आशाओं का, बन ही जाए ताल-मेल,

सोचना पड़ जाये, एक बार तो ‘खुदा’ को भी 

 बदल ही दे, भाग्य 

 देखकर,  हमारा बढ़ता हुआ “मनोबल” ॥


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