दिन बदल जाएँगे


बूट पालिश से भरे हाथ 

चले जा रहा ‘लटकाये झोले को’

 सीना ताने, हल्की सी मुस्कुराहट होंठों पर ,

 कानों साथ,  आँखें भी थी चौकन्नी 

 देखता जा रहा  मुड़ मुड़ के पीछे 

कभी ‘कोई पुकार रहा हो’,  पीछे से ही ।


‘दौ रुपये में’ 

चमक जाएंगे करवा ही लीजिए

 काम तसल्ली से होगा,  विश्वास तो कीजिए ,

 ‘कितनी ही बार’ दोहरा रहा था,अपने शब्दों को 

आवाज़ आते भाग लेता, ‘आतुर था’ काम करने को ।


 ‘बिना काम’ के

 पैसे लेना भीख दिख रहा था उसको

 ‘बस मेहनत का’ ही चाहिए अपनी झोली में ,

कैसे   ख़ुद्दारी कूट-कूटकर भर गई अभी से

 इस मासूम ‘छोटी सी जान’ में ।


बदलेंगे जल्द ही दिन अब तो, 

 उस ‘बाबा ने’ भी कह दिया,

शांत बैठकर कुछेक देर वहीं पर

‘हाथ की लकीरों को’ घूरता रहा ,

रुकते ही रेलगाड़ी के, मस्तमौला सा 

कूदता फाँदता चला गया ,

 “दिन बदल जाएँगें” जल्दी ही 

  यक़ीन मन में, अब तो बिठा लिया ।।

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