दिन बदल जाएँगे
बूट पालिश से भरे हाथ
चले जा रहा ‘लटकाये झोले को’
सीना ताने, हल्की सी मुस्कुराहट होंठों पर ,
कानों साथ, आँखें भी थी चौकन्नी
देखता जा रहा मुड़ मुड़ के पीछे
कभी ‘कोई पुकार रहा हो’, पीछे से ही ।
‘दौ रुपये में’
चमक जाएंगे करवा ही लीजिए
काम तसल्ली से होगा, विश्वास तो कीजिए ,
‘कितनी ही बार’ दोहरा रहा था,अपने शब्दों को
आवाज़ आते भाग लेता, ‘आतुर था’ काम करने को ।
‘बिना काम’ के
पैसे लेना भीख दिख रहा था उसको
‘बस मेहनत का’ ही चाहिए अपनी झोली में ,
कैसे ख़ुद्दारी कूट-कूटकर भर गई अभी से
इस मासूम ‘छोटी सी जान’ में ।
बदलेंगे जल्द ही दिन अब तो,
उस ‘बाबा ने’ भी कह दिया,
शांत बैठकर कुछेक देर वहीं पर
‘हाथ की लकीरों को’ घूरता रहा ,
रुकते ही रेलगाड़ी के, मस्तमौला सा
कूदता फाँदता चला गया ,
“दिन बदल जाएँगें” जल्दी ही
यक़ीन मन में, अब तो बिठा लिया ।।
Super se bhi upper 👍
ReplyDeleteAmazing!
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