आख़िरी डगर

कहने को ही नहीं ,  वास्तव में भी

‘घर का ताला’ और गली का   था पहरेदार

 बिलख रहे सारे ,हादसे ने कर दिया सबको बेहाल 

 न घड़ी देखी   ना ही सोचा कोई  पहर 

बस चल दिया बन मुसाफ़िर ,अपनी आख़िरी डगर ।


हिला गया सारा आँगन, एक ‘हवा का झोंका’ आकर 

उठ गया सिर से ही साया और ‘ख़ाली हो गया’ बिस्तर ,

 चेहरे हैं उदास आँखों में पानी का है समुद्र 

 बन ही गया ‘बहाना’ चलने का ,उस आख़िरी डगर ।


ये ‘कमी खलेगी’ कोई न ले पाएगा जगह उनकी

 फिर चल पड़ती है ,नहीं रुकती ज़िंदगी यूँ किसी की ,

 रोकना तो पड़ता ही है ,आँसुओं का सैलाब मगर ।

बहुत दूर मिली है मंज़िल उनको 

नहीं आएंगे वापस लौटकर अब तो 

वक़्त ने ही तय कर दी  उनकी “आख़िरी डगर” ॥

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