आख़िरी डगर
कहने को ही नहीं , वास्तव में भी
‘घर का ताला’ और गली का था पहरेदार
बिलख रहे सारे ,हादसे ने कर दिया सबको बेहाल
न घड़ी देखी ना ही सोचा कोई पहर
बस चल दिया बन मुसाफ़िर ,अपनी आख़िरी डगर ।
हिला गया सारा आँगन, एक ‘हवा का झोंका’ आकर
उठ गया सिर से ही साया और ‘ख़ाली हो गया’ बिस्तर ,
चेहरे हैं उदास आँखों में पानी का है समुद्र
बन ही गया ‘बहाना’ चलने का ,उस आख़िरी डगर ।
ये ‘कमी खलेगी’ कोई न ले पाएगा जगह उनकी
फिर चल पड़ती है ,नहीं रुकती ज़िंदगी यूँ किसी की ,
रोकना तो पड़ता ही है ,आँसुओं का सैलाब मगर ।
बहुत दूर मिली है मंज़िल उनको
नहीं आएंगे वापस लौटकर अब तो
वक़्त ने ही तय कर दी उनकी “आख़िरी डगर” ॥
Very emotional
ReplyDeleteBut part of life
Likhte rho👍
Really akhiri dgr
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