दृढ़ निश्चय

           अध्याय ४

  

          फटे-पुराने कपड़े और उलझे हुए बाल,गिड़गिड़ा कर लोगों के आगे हाथ फैलायें जा रही थी ।कितनी ही मजबूरी रही होगी इसकी ,ये दिन देखने पड़ रहे थे ।अच्छी-बुरी नज़रों से गुज़रना पड़ रहा था । भीख माँगना  किसे अच्छा लगता है ,पर मज़बूरी इंसान से सब कुछ करवा देती है ।

                    पड़ोसियों को भी शायद भनक लग चुकी थी पर किसी ने भी आकर सिर पर हाथ नहीं रखा, मिलना तो दूर की बात है पानी  तक नहीं पूछा ‘जब सगे ही अपने नहीं तो पड़ोसी किसके’ ।अपने पैरों को घसीटते हुए चली जा रही थी क्योंकि पैर भी उसका साथ नहीं दे रहे थे । उसकी ज़िंदगी ग़ैरों ने नहीं अपनों ने  रूला दी थी । सही मायने में वह आज ‘अनाथ’ हुई थी ,अपने भाइयों की कड़वी बातें अब भी उसके दिल में तीर के जैसे चुभ  रही थी ।

                भारी कदमों से और आँखों में पानी लिए वह धीरे-धीरे चली जा रही थी ,तभी गली के कोने वाली दुकान पर चल रहा गाना उसके कानों में पड़ा  “चल उड़ जा रे पंछी ये देश हुआ बेगाना”  और उसका तो सबकुछ  आज बेगाना हो गया था ।वह अपने आपको अंदर से संभालने की कोशिश कर रही थी। अपने संघर्ष के दिनों को फिर से याद किया । उसने ख़ुद को खिलाड़ी महसूस किया जो “हार निश्चित देखकर भी मैदान नहीं छोड़ता” और बहादुरी से डटकर सामना करता रहता है ।        

                  समाज की सच्चाई है “बुरे वक़्त में कोई भी साथ नहीं देता” । बहती हुई आँखें हाथों से साफ़ की ,शान से गर्दन ऊँची कर  दुपट्टा संभाला और अपने मन में एक “दृढ़ निश्चय” कर लिया कि वह आत्म-सम्मान से जीयेगी ,ख़ुद के लिए ।ना रोएगी ना विचलित होगी और चेहरे पर आत्मविश्वास लिए चल पड़ी ‘नया रोज़गार ‘ ढूंढने रोज़गार कार्यालय की तरफ़ — ।

                                   

                             -  समाप्त -

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