नया कदम
छुप-छुप कर बालकनी से झाँकती ,
असमंजस से भरा चेहरा
नहीं पता उसको कि तेरा कल कैसा होगा ,
स्कूल का झोला मिलेगा या झाड़ू पोंछा ही करना होगा ।
बीत जाएगी क्या उसकी भी ज़िंदगी मॉं की ही तरह,
कुछ तो सोचा होगा क़िस्मत ने ,आगे बेहतर क्या होगा ।
मॉं ने भी मिन्नतें की होंगी भगवान के दरबार में,
न रूलने देना बचपन को ज़िम्मेदारी में उलझाकर ।
निकलेगा क्या,नया दिन नयी आशा बनके
पलट जाएगा क्या अतीत भी,तूफ़ान सा उड़कर ।
नहीं बनना क़ैदी फिर से उन लोहे सी जंजीरों का ,
अब “नया क़दम” रखवा ही दे ‘ऐ ज़िंदगी’
एहसास आज़ादी का दिलवाकर ।।
Aasha bhri hai poem me👍
ReplyDeleteAndhere se ujale ki or
ReplyDeleteGud one
ReplyDelete