नया कदम

छुप-छुप कर बालकनी से झाँकती ,

असमंजस से भरा चेहरा

 नहीं पता उसको कि तेरा कल कैसा होगा ,

 स्कूल का झोला मिलेगा या झाड़ू पोंछा ही करना होगा ।

 बीत जाएगी क्या उसकी भी ज़िंदगी मॉं  की ही तरह,

कुछ तो सोचा होगा क़िस्मत ने ,आगे बेहतर क्या होगा ।


मॉं ने भी मिन्नतें की होंगी भगवान के दरबार में,

 न रूलने देना बचपन को ज़िम्मेदारी में उलझाकर ।

निकलेगा क्या,नया दिन नयी आशा बनके 

पलट जाएगा क्या अतीत भी,तूफ़ान सा उड़कर ।

नहीं बनना क़ैदी फिर से उन लोहे सी जंजीरों का ,

अब “नया क़दम” रखवा ही दे  ‘ऐ ज़िंदगी’

एहसास आज़ादी का दिलवाकर ।।

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