बेहतर वक़्त
गंदगी के ढेर में कमर तक धँसे हुए
मुँह नाक को आधा-अधूरा ढके हुए ,
नहीं सुध अपनी जरा भी उनको,
बिना वक़्त देखे, गीला कचरा-सूखा कचरा
छाँटते जा रहे हैं झुक-झुककर ।
बनाना पड़ा रोज़गार ये ,हर वक़्त जंग जीत रहे
मजबूरी कहें या वक़्त का फेर ,सब कुछ झेल रहे ,
पूरे दिन मज़दूरी करके मिलते हैं कमाई के पैसे
तभी चुल्हा भी चढ़ता है जाकर ।
भूखे पेट दिन-रात कर रहे है ,जी-तोड़ मेहनत
नहीं छोड़नी कसर कोई ,भविष्य करना है सुरक्षित ,
थके-हारे घर पहुँचकर मिट जाती है थकान तो
बच्चों की मुस्कान देखकर ।
अपनी फ़िक्र नहीं ,
खपा रहे ख़ुद को, ज़िंदगी बच्चों की बनाने में ,
नहीं फँसने देना उन्हें भी इस ,कचरे के दलदल में
बिना सम्भालें ‘ज़ख़्म’ अपने शरीर के,जुटे हुए हैं
‘ बेहतर वक़्त’ की ख़ातिर ।।
Schai h life ki 👍
ReplyDeleteNice
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