बेहतर वक़्त


गंदगी के ढेर में कमर तक धँसे हुए 

मुँह नाक को आधा-अधूरा ढके हुए ,

नहीं सुध अपनी जरा भी उनको, 

बिना वक़्त देखे, गीला कचरा-सूखा कचरा 

                छाँटते जा रहे हैं झुक-झुककर ।


 बनाना पड़ा रोज़गार ये ,हर वक़्त जंग जीत रहे 

 मजबूरी कहें या वक़्त का फेर ,सब कुछ झेल रहे ,

 पूरे दिन मज़दूरी करके  मिलते हैं कमाई के पैसे

                    तभी चुल्हा भी चढ़ता है जाकर ।


भूखे पेट दिन-रात कर रहे है ,जी-तोड़ मेहनत

नहीं छोड़नी कसर कोई ,भविष्य करना है सुरक्षित ,

 थके-हारे घर पहुँचकर  मिट जाती है थकान तो 

                          बच्चों की मुस्कान देखकर ।


अपनी फ़िक्र नहीं ,

खपा रहे ख़ुद को, ज़िंदगी बच्चों की बनाने में ,

नहीं फँसने देना उन्हें भी इस ,कचरे के दलदल में 

 बिना सम्भालें ‘ज़ख़्म’ अपने शरीर के,जुटे हुए हैं 

                         ‘ बेहतर वक़्त’ की ख़ातिर ।।

 

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