दृढ़ निश्चय

          अध्याय १


       प्रिया ‘बहुत दुखी मन’ से अपने घर को छोड़कर जा रही थी और उसे विदा करने वाले कोई और नहीं  ‘उसके भाई ‘ ।उसे घर से निकाल कर ‘जीत’ अनुभव कर रहे थे और उनकी पत्नियाँ तो बहुत ही ख़ुश थी जैसे किसी “बोझ “से छुटकारा मिल  रहा हो ।प्रिया  ने उन्हें समझाने की कोशिश की, यह भी बोला कि”जैसे तुम कहोगे मैं वैसे ही तुम्हारे साथ रह लूँगी” ।और तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी। पर उन्होंने तो जैसे सोच ही लिया था कि आज इसको घर से निकालना ही है।प्रिया के समझाने का उन पर कोई असर नहीं पड़ा । लेकिन फिर उसने वहाँ रूकना उचित भी नहीं समझा ।

            प्रिया ने अपनी ‘आंसुओं से भरीं आँखें ‘दुपट्टे से साफ़ की ओर अपना सामान लेकर चल पड़ी ।रास्ते में रह -रह कर बिती बातें याद करती जा रही थी, आख़िर वो तो उसका ही घर था। उसे वो समय याद आ रहा था जब वो बेसहारा हो गए थे ।उनके माँ बाप सड़क हादसे में दुर्घटना का शिकार हो गए और हमेशा के लिए उनको छोड़कर चले गये थे । प्रिया और उसके भाई अब अनाथ हो चुकें थे ।प्रिया ने ही उनको पाला-पोसा बिल्कुल अपने बच्चों की तरह समझ कर बड़ा किया ।वह इतनी भी बड़ी नहीं थी ,फिर भी माँ-बाप ‘बन कर ‘प्यार दिया ।

                   जैसे-तैसे वह घर चला रही थी। जब वह अपने ऑफ़िस  में जाती तो लोग उसे तरह-तरह की नज़रों से देखते । माँ बाप नहीं थे तो, उलटें -सीधे तानें देते रहते थे । वह सब “वक़्त की मार” समझ सहन करती रहती थी । 

                    उसकी भी उम्र शादी लायक हो चुकी थी पर उसके आगे उसके भाईयों की ज़िंदगी थी ,जिन्हें पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाना चाहती थी । रिश्तेदार भी उसके लिए कई लड़कों की शादी का प्रस्ताव लेकर आये पर उसने सबको   मना कर दिया । क्योंकि कोई भी ये नहीं चाहता था कि उसके भाई उसके साथ रहते रहे । इसलिए उसने हर बार शादी से इंकार करना ही पड़ता । To be continued……..

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