परख

रिश्ते होते हैं पतंग की डोर जैसे जो परख कर बाँधीं जाती हैं ,

कभी ख़ुद कट जाती है तो कभी कोई काट के चला जाता है,

कभी ख़ुद उड़ जाती है,कभी कोई साथ लग कर उड़वा देता है ।


 रुठना फिर मनाना रिश्तों की दुनियादारी का हिस्सा है,

 कभी समझ से ऊपर उठ कर तो,

कभी पानी जैसे शांत बनकर संभाले जाते हैं ।


इज्ज़त और प्यार ,लेने का देना बन गया हैं अब तो,

परखने के चक्कर में रिश्तों की डोर, टूट कर छूट जाती है ।

 कभी-कभी ग़ुरूर में कुछ ऐसा हो जाता हैं 

उम्मीद फूलों की होती है मुट्ठी काँटों से भर जाती हैं ।


सोचते हैं जो रिश्ते हमें भीतर से तोड़ रहे हैं ,

वह टूट ही जाए तो ही अच्छा है पर-

नहीं रह पाते उनके बिना जो बसते हैं दिल के कोने कोने में ,

और “परखते” ही रहे तो बचे-खुचे भी बह जाते है शिकवों में ।।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े