सफ़र
वैसे तो हैं , अपनी भी, ख़्वाहिशें थोड़ी सी,
अभी शुरू ही किया है, ज़िंदगी का सफ़र तो असलियत में,
रास्ते तो बना ही रहे थे लगातार हम भी, एक अरसे से ।
महसूस कर रहे है अपने संग चलते हुए लम्हे
हँसते-रोते सरकाते जा रहे है अच्छे बुरे दिन ,
छाँट-छाँट कर चुन भी रहे हैं, उम्मीदों की कलियाँ
भर रहे है झोली में ,शायद खिल जाएँगी ही एक दिन ।
लगता हैं बहुत दूर निकल आए हम
जरा रूककर, मुड़कर, पीछे देखें तो सही,
देखें पकड कर अपने भविष्य के, उड़ते बिखरते पन्ने
सन्नाटा पसरा हुआ है ,छायी हुई तो थोड़ी ख़ामोशी ही ।
थोड़ा सुस्ता-कर लें तो लें-
ज़िंदगी के सफ़र का हिसाब-किताब जरा,
पहुँचे जहा “सफर” तय करके , आ ही गई मंज़िल या -
अभी बाक़ी है पड़ाव भी आना ।।
Bhut badiya
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