बदले ना मौसम
वो छन -छन
करती गूँजा रही थी घर को
चूड़ियाँ हाथों में ढेर सारी, पैरों में पायल भारी ,
चेहरे को पढ़ नहीं पा रही थी मैं फिर भी
कभी उदास थी तो, कभी मुस्कुरा रही थी ,
बदल रहा था मौसम के जैसे, चेहरा उसका
तेज आँधी तो कभी धूप सी ,खिल खिला रही थी ।
पैरों में
‘आलता’ वो भी गहरा लगा हुआ
दिखा रहा था सुंदरता उसके पैरों की
उभर आये छालों को भी था छिपाये हुए ,
अपनी ही छमछमातीं धुन को सुन रही थी
झुक-झुककर देख हँसे जा रही थी ,
शायद आज दिल में सुकून है इसके
बदल न जाए मौसम बिन बताये
ये भी होगा डर , इसके तो मन में ।
भाग-भागकर
आज काम भी निपटाया
जाते जाते होले से मुस्कुरा हाथ भी हिलाया,
दुआ करेंगे हम भी ,तुम्हारे लिए ख़ुदा से
“बदले ना मौसम” बिना बताए ,बिना पुछे तुमसे ।।
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