हाथों की छाप

नहीं है ख़ुशी का ठिकाना 

आज दो-दो घर हो गए उसके 

पली-बड़ी जहां ,चल पड़ी है आज वहाँ से ,

छोड़ी है ‘छाप’ अपने हाथों की इन दीवारों पर 

जिनके साथ बिते सालों-साल  हंस-खेल के ।


 मुड़ मुड़कर देखती गई हाथों की छाप को

 फिर लौट कर आऊँगी  ‘मिटने मत इन को’,

गुज़ारिश हवाओं से भी क़र दी है जाते जाते 

          सहेजे रखना ख़ुशबू में, मेरी यादों को ।


दहलीज़ नई,नए लोग ,नई ख़ुशबू हवा की 

रच-बस जाएगी इस आंगन की रूहों में भी ,

रहेगी कोशिश,  हमेशा-

बनके ‘पीपल की जड़ों सी’ मज़बूत

  मिट्टी का आख़िरी छोर छूने तक की  ।


जमाकर तसल्ली से रख ली है हथेली 

अपना एहसास करवा कर दीवारों को ,

 मिटे ना कभी, महेंदी भरें “ हाथों की छाप “ 

                 अब मैं लक्ष्मी हूँ इस घर की ।।

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