एक था जसमत
उसका नाम तो जसमत था । पर सब उसको राजू ही बोलते थे । “लाड़-प्यार का नाम”, जो एक बार टिक गया तो सारी उम्र वहीं रहेगा ।
“अगर लाड़-प्यार की बात करें तो सच में लाड़ला था” । जब तक छोटा था ।
मामा ,नाना ,नानी ,भाई-बहन सब बहुत प्यार करते थे । यही नहीं, मामा के बच्चे भी बहुत इज़्ज़त देते थे उसको ।
“दें भी क्यों नहीं, वह उनको अपने सगे भाई-बहन से भी ज़्यादा प्यार करता था” ।
उसमें एक ख़ासियत थी । “कोई उससे कैसा भी व्यवहार करे फिर भी ख़ुश रहता” । चुप रहता और हँस के टाल देता ।
लेकिन राजू का इस्तेमाल सब रिश्तेदारों ने बहुत किया । बहुत काम करवाते थे उससे ।
“और इज्ज़त के नाम पर बस मज़ाक उड़ाते” ।
जब हम छोटे थे तो उसके आते ही उसके पीछे-पीछे घूमते रहते थे । बहुत क़िस्से कहानी सुनाता था ।
जाते हुए पैसे देकर जाता —“ले लो, बड़ा भाई फिर तो बहुत दिनों के बाद ही मिलेगा” ।
क़िस्मत अलग ही लिखी हुई थी उसकी । “ना पढा- लिखा, ना ही किसी काम में बरकत हुई” ।
रही-सही कसर तब पूरी हो गई , “जब सारी ज़मीन परिवार के झगड़े सुलझाने में ही ख़त्म हो गई” । ज़मीन जायदाद के नाम पर बस पुराना मकान ही था ।
एक-दो बीघा ज़मीन अब भी बची गई थी उसके पास । “लेकिन अपने लड़के को विदेश भेजने के लिए वह भी बेच दी” ।
“कुछ ज़्यादा काम-धंधा भी नहीं था उसके पास” ।
एक बड़े से बरगद के पेड़ के नीचे “चाय का खोखा” लगाया हुआ था । “चारों तरफ़ सड़क जाती थी और वह पेड़ सड़क के बिलकुल बीच में था” ।
उसको यह था कि आते-जाते यहाँ पर ज़रूर रुकेंगे और चाय लेंगे । ग्राहक आते ही रहते थे ।
पाँच-छह बजे तक चाय बेचता था । “फिर थोड़ा अंधेरा होते ही वही हर-रोज़ का काम” । कोई नहीं मिलता तो अकेले ही शराब पीने बैठ जाता ।
डॉक्टर ने उसको समझाया भी —“रुक जाओ अब शराब पीने से, तुम्हारा शरीर कभी भी जवाब दे सकता है ” ।
“लेकिन समझाने का कोई असर नहीं हुआ” ।
उसके परिवार में पत्नी और बच्चे ही थे । “समझाएँ भी तो किसको और कौन से तरीक़े से” । उनके ऊपर से भी बात निकल जाती थी ।
“और हम एक लंबा सा भाषण देकर फ़ालतू जैसे बन जाते थे” ।
उसका शरीर दिन पर दिन बीमारियों से घिरता जा रहा था । धीरे-धीरे उसके शरीर के सारे अंग ख़त्म होते गए ।
“या यूँ कह सकते हैं कि शरीर में सिवाय साँस चलने के कुछ बचा ही नहीं था” ।
मुझे अब भी याद आ रही है उसकी एक बात । हम उसको हमेशा बोलते थे — अपने छोटे भाई-बहन को पढ़ा लो ।
एक ही जवाब दे देता था —“इनको पढ़ा-लिखा दिया तो ज़्यादा ऊपर निकल जाएँगे” । रहना तो गाँव में ही है ।
“पढ़ने के बाद मेरी इज़्ज़त करना छोड़ देंगे” ।
राजू ने अपने बच्चों को तो पढ़ाने की कोशिश की पर उनको माहौल नहीं दे पाया । “नशे में डूबा रहता तो बच्चे भी नहीं सुनते थे” ।
उसकी पत्नी भी अनपढ़ ही थी । “बिल्कुल भी चतुर औरत नहीं थी,जो सब कुछ संभाल लेती” ।
अब तो आने-जाने वाले राजु से मिलने आने लगे । “क्या पता दोबारा ना ही मिल पाये” । डॉक्टरों ने अस्पताल में रखने से मना कर दिया ।
यह सोचकर की दवाइयों का असर इस पर अब होगा नहीं और अस्पताल में रखकर क्या करें । एक दो दिन के ही साँस बचे हैं ।
“और परिवार के पास इतना पैसा भी नहीं था कि अस्पताल का बिल दे सके” ।
उसके परिवार को यही बोला गया—“अच्छा रहेगा घर ही ले जाओ” । आख़िरी साँस घर ही ले लेगा । “अब सब इंतज़ार कर रहे थे उसकी आख़िरी साँस का” ।
“वह आख़िरी साँस रात-दिन में कभी भी आ सकती थी” ।
अस्पताल से आये अभी बस एक दिन ही हुआ था और अचानक शोर से आंगन भर गया । “रोने की आवाज़ सुनकर पड़ोसी इकट्ठा हो गए” ।
वह अटकी हुई साँस भी शरीर को छोड़कर चली गई और “उसकी सांसारिक यात्रा यहीं ख़त्म हो गयी” ।
जसमत ऐसा था , वैसा था । राजा की कहानी की तरह उसकी ज़िंदगी के भी बहुत क़िस्से याद आने लगे ।
शायद “एक था …….जसमत” ऐसे ही ।
वह दुनिया से विदा हो गया और हम उससे कोसों दूर बैठे “उसकी अच्छाई-बुराई स्वभाव को याद करते ही रह गए” ।।
Reality
ReplyDeleteWell described
ReplyDeleteHats off ma'am
ReplyDeleteAmazing story seems realty
Nicely written
ReplyDeleteExcellent 👍
ReplyDeleteWow🙏🏽
ReplyDeleteTrue story
ReplyDeleteAwesome
ReplyDeleteYes ek tha jasmat
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