जज़्बा

 ऊँची इमारत  पर पंख फैलाता हुआ पक्षी,

        नीचे  बैठे हुए पंछियों को बार -बार पुकार रहा है।

“ देखो “ छू ही लिया आज आसमान को ,

                दूर तक देख रहा हूँ सारा जहां ,

ली है आज उड़ान हौंसलो ने 

          गले मिलकर , चोटियों को चूम रहा हूँ ।।


तालाब किनारे बैठा परिन्दा  भी ,

           ऊँची गर्दन करके नज़रें मिला रहा है ।

तुमने कर ही दिखाया हिम्मत बटोरकर,

        लगता है आसमान भी तुमसे मिलकर इतरा रहा है,

लग्न करके लांगी है कितनी ही बाधाएँ ,                         

         जज़्बा था कुछ करने का , तभी ऊँचाइयाँ छू रहे हो  ।।

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