“ दूसरी दुनिया “

          “ बुआ”  यह रिश्ता सुनते  एक ही  “नाता “ याद आता है ।पापा की बहन,  दादा की बेटी या फिर रिश्तेदारी में रहने वाले अंकल की बहन ।

                चौड़ी सड़क पर बहुत  संकरी सी गली थी और   बहुमंज़िला घर  । बहुत सारे लोगों का डेरा होता था ,वो पुराना और खंडर जैसा मकान  । यही पर रहती थी  “बुआ” । सारे शहर की ख़बर होती थी उसे, घर-घर जाकर बधाइयाँ देना ,नाचना- गाना सब उसकी दिनचर्या होती थी  सुबह से शाम होने तक । अपने जैसे ही बहुत से लोगों  को सहारा दिया हुआ था उसने । वह छोटी -मोटी देसी दवाओं से इलाज भी करती थी । नज़र उतारने में तो माहिर थी ।हर कोई उसे अपने घर बुलाकर ले जाता था।और वह किसी को मना भी नहीं करतीं थी ।

                 दुनिया के परिवारों को “हँसी- ख़ुशी “रहते देखकर उसका भी मन विचलित होता होगा ।सबका ही सपना होता है एक प्यार करने वाला साथ रहने वाला “ भरा- पूरा “परिवार हो ।जिसमें भाई -बहन ,माता -पिता और रिश्तेदार भी साथ हो ।

                उनके ज़िंदगी के कई पहलुओं को सुना था हमने ।अपने जन्म के समय का ज़िक्र किसी से करना भी पसंद नहीं करती थी ।फिर भी बहुत दुःखी मन से बताया करती थी  कि पैदा होते ही “ माँ -बाप “ ने उसे त्याग दिया था । To be continued……………


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