ऐसी ही तो है वो


हाड़ माँस की नहीं ‘लोहे की बनी’ है शायद 

 चिंता सबकी है  बस नहीं है तो खुद की ही ,

 ‘दो घुँट चाय’ की रहती है ललक उनको ,

       है इसमें ही ख़ुश,  ऐसी ही तो है वो ।


‘वार-फेरकर’  दुख उतार भगाना चाहती है सबके 

 कभी नज़र उतारने के लिए

 जतन करती है नए नए ,

क्यों नहीं कर पाती कभी

 ‘अपने लिए भी’ ये सब वो ।

 

 बचपन से ही देखा है लगे हुए सारा दिन

 आते हैं हमारे तो शनिवार इतवार भी 

पर उनके लिए नहीं बना ‘कोई भी दिन’ ,

दर्द याद रहता है औरों का पर-

‘अपने घुटने का’ भूल जाती है वो ।


 मासूम सा चेहरा है ‘मेरी माँ का’

हंसती तो ‘खिल जाती है’  कली सी,

हमेशा बरसती है सबके लिए 

प्यार और दुआएँ उनके दिल से 

  हाँ सच में  “ऐसी ही तो है वो” ।।


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