Fursat ke pal

 एक बार नहीं बहुत टटोला है ख़ुद को ,

लगता था फिर से उठा ले अपने मन को ,

रंग बिरंगे पन्ने अब भी बोल रहे है 

एक एक करके अपनी गठरी खोल रहे हैं ।

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