दहलीज़ । वास्तव में यह शब्द सुनते-सुनते ही बड़े हो रहे है । “लेकिन आप भी गौर करे कि उम्र की एक ही दहलीज़ तो नहीं होती”। “ पहले बचपन तक की , फिर जवानी की , फिर प्रौढ़ अवस्था की ,और फिर बुढ़ापे की दहलीज़” । सबसे बड़ी हो जाती है तो बुढ़ापे की । कोई-कोई जल्दी बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँच जाता है । “ तो कोई उस दहलीज़ की अनदेखी करके ख़ुद को जवान और तन्दुरुस्त रखता है”। मेरे पास भी एक ऐसी ही शख़्सियत है “जिन्होंने बुढ़ापे की दहलीज़ को ताला लगाकर रखा है” । मुझे ज़्यादातर वह सैर करते भी नज़र आते है । ...
फिर से नया साल आने वाला है । पुराने के बस 10 /11 दिन ही तो बचे हैं । “लेकिन साथ ही बच गईं बहुत सारी ख़्वाहिशें ,सपने” । कह सकते हैं कि उम्मीद जगा कर नए साल का स्वागत किया था । “एक डायरी तो स्पेशल इसलिए लगायी थी कि जो याद आता रहेगा, साथ-साथ लिखते भी रहेंगे और महीने के हिसाब से पूरा भी कर लेंगे “। सोच ही रही थी कि खिड़की से थोड़ी सी धूप चमकती हुई दीवार पर दिखाई दी । जो सूरज के घूमने के साथ-साथ घूमती जाएगी फिर धीरे से ग़ायब भी हो सकती है । लेकिन फिर यह ख़्याल भी आया है कि कल जब आएगी तो पहले ही आकर बैठ ...
आज उसको घर के दरवाज़े बंद करते हुए देखा जो ज़्यादातर खुले पड़े रहते थे । वैसे तो साल-भर मिलते रहते हैं । “लेकिन कल वाली “सोनी” को देखा तो लग ही नहीं रहा था कि वह पहली वाली ही है” । ऐसा लगा कि उसको कभी समझ ही नही पाये । “दिल करता उसका तो , अच्छे से बोल लेती नहीं तो मुँह फेरकर निकल जाती थी” । अभी तो धीरे-धीरे उसके रहन-सहन का पता चल रहा था । चुलबुली सी भी है तो कभी बिल्कुल चुप -चाप रहने वाली । कभी कभार ऐसे लगता “जैसे बहुत कुछ गंवाकर बैठी है अपनी ज़िंदगी में” । ...
काश हम भी पंछी होते
ReplyDeleteChaa ge guru
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