जगाने लगा है ज़मीर

 दुनियाँ के इस ‘मेले’ में खो गए है कहीं

 कहाँ से शुरू किया था चलना अब याद ही नहीं ।

मुड़कर देखना चाहा पर

 भीड़ ने बहुत ‘आगे धकेल’ दिया ।

 खो गए वो रास्ता ही

जिनको भी पकड़कर बढ़ना चाहा ।


किसी ने रास्ता गलत बताकर , आगे बढ़ा दिया 

धक्का दिया आकर किसी ने ,

    मक़सद से ही ‘भटका दिया’ ।

चलते रहे सारी उम्र  बिना सोचे समझे 

 न चाहा कभी वजूद तलाशाना 

            न ही चले संभल कर ।


 जगा रही है अंतरात्मा—

   क्या ‘खो दोगे’ सारी उम्र ?

  गिरते-पड़ते  यूँ ही, ठोकरे खा खा-खाकर ।


होने लगा महसूस ‘बदलाव’, अब अंतर्मन में

तन मन भी ‘रमने लगा’ आत्मविश्वास में 

होना ही पड़ेगा ‘सचेत’ अब तो

          “जगाने लगा है ज़मीर” ।।


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