कुर्ते की जेब


आज भी वही साइकिल , वही टिफ़िन 

रास्ता भी तो वही था ,

 बस थी तो ‘एक आशा नयी’

 जो जगमगा रही थी आज, उसकी आँखों को ।


 था आज दिन,  

रुका हुआ मेहनताना मिलने का

 चार क़दम का रास्ता,  

बहुत लम्बा हो गया शायद ,

पर सब्र था मन में 

हाथ था कुर्ते की जेब में 

दिमाग़ था ‘ख़्वाहिशों की गिनती’ में ।


हमेशा की तरह

 छोटा गिलास चाय ,और बिस्किट साथ 

चाय के साथ बिस्किट की भी बढ़ गई मिठास ,

नहीं लिया आज उधारी से , 

बकाये के साथ, चुकता हुआ है आज तो ब्याज ।


 ढीले से कुर्ते की जेब लटक रही थी 

क्योंकि आज भार था पैसों का ,

बयान नहीं करना आ रहा दिल को 

डालें हाथ  “कुर्ते की जेब”  में 

बस झूम रहा था, सोच रहा था ,

जल्द-जल्द पैडल लग रहे थे 

उतावला था घर जाने को ॥

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