ना ना ऐसा नही है
यहाँ आ जाओ सारे जल्दी से —ताई जी ने ज़ोर से आवाज़ लगाकर बुलाया । “चलो चलो, फ़ोटो करवा लेते हैं —तभी दूसरी तरफ़ से आवाज़ आयी” ।
यहाँ आओ पहले — “गुलदाना ,लड्डू बताशे, सबके पैकेट भी बनाने है” ।
सब को देखकर ऐसा लग रहा था । “जैसे बहुत ही ज़्यादा काम था और समय कम था सबके पास” ।
क्योंकि सब दूर-दूर से आये हुए थे । वापिस रात तक अपने घर भी जाना था सबको ।
“तभी ज़ोर से हँसी मज़ाक करने की आवाजें आनी शुरू हो गईं” । हम लोग भी काम बीच में छोड़कर बाहर देखने को लपके ।
“ गली-मोहल्ले से बहुत सारी औरतें आ चुकी थी” ।
बधाई गीत गाने भी लग गए । मिलकर बीच-बीच में एक- दूसरे को देख कर हंस पड़ते । “कुछ ऐसी हँसी ठिठोली हो रही थी , लग रहा था जैसे घर में कोई शादी-ब्याह है “।
अंदर पुरुष बैठे हुए थे और औरतें ऐसे समूह में बैठी हुई थी कि देखना पड़ रहा था ।
“कौन कहाँ पर बैठी हुई थी । सिर्फ़ आवाज़ सुनकर ही पता चल रहा था कौन है” ।
एक घंटे के अंदर ही सबने नाच-गाकर अच्छा ख़ासा माहौल बना दिया । “हम भी ख़ुद को नहीं रोक पाए और उनके बीच में जाकर रम गये” ।
“आप भी अब तक सोच रहे होंगे , खाना-पीना नाच-गाना सब हो रहा है । शादी भी नहीं है तो फिर इतना तामझाम किसलिए” ।
जो बाहर से मोहल्ले की औरतें आयी हुई थी ।. “उनको मिठाइयां और उपहार के तौर पर गिफ़्ट भी बाँटे सबने मिलकर” ।
सबने प्यार से लिया और नवजात बेटे को ढेर सारे आशीर्वाद दिए और सभी ने शगुन भी दिया ।
“हमें लगा कि अब प्रोग्राम ख़त्म हो गया” ।
तभी शोरगुल हुआ कि बच्चे के ननिहाल से परिवार आ गया । “और बहुत सारे गिफ़्ट और मिठाइयां और भी बहुत सारा सामान” ।
“कमरा ही भर गया सारा । बैठने की जगह ही नहीं बची” ।
रिश्तेदारों के चेहरे पर ख़ुशी साफ़ दिखाई दे रही थी । कुछ तो इतना सारा सामान देखकर अचंभित थे ।
“उसमें से कुछ इसलिए भी ख़ुश थे कि इस सामान में से उनको भी तो मिलेगा” ।
यह सब देखकर , दिल में एक बात दिमाग़ में बार- बार आती रही । “दो साल पहले भी परिवार में बच्ची पैदा हुई थी तब तो ऐसा कुछ नहीं हुआ” ।
“किसी ने मिठाई का डिब्बा भी नहीं बाँटा” ।
“मिठाई तो बस लड़का पैदा होने पर ही बटती है” ।
पढ़े लिखे दादा-दादी ,नाना-नानी बड़ी-बड़ी नौकरियां बड़े -बड़े शहरों में रहने वाले ।
“फिर भी ऐसी दक़ियानूसी सोच” ।
शायद दुनिया में सब कुछ बदल गया लेकिन बेटा-बेटी को लेकर बनी हुई सोच ऐसे ही चलती आ रही है ।
“अब तक तो नहीं बदली । आगे के आसार भी नहीं दिख रहे” ।
सबके चेहरे पर मिलेजुले भाव होते हैं हमेशा से ही । “जोकि बातचीत करते ही उसको टालना चाहते हैं , ना ना ऐसा कुछ नहीं है” ।
“ बेटा-बेटी सब बराबर हैं हमारे लिए तो” ।
“एक रटा-रटाया वाक्य जो कभी भी किसी के मुँह से सुनाई दे जाता है । ना बदलने वाले समाज में” ।
लेकिन सच्चाई तो सबके सामने है । “आज भी है , कल भी थी और आगे भी यही रहेगी” ।
इस बारे में कोई भी ,कभी भी बात छेड़ते ,हम में से कोई फिर बोल देगा — दोनों बच्चे ही हमारे लिए तो बराबर है ।
“आप ज़्यादा सोच रहे हो इस बारे में । “ना ना ऐसा नहीं है” ॥
Time is changing
ReplyDeleteIn some families welcome daughter as well
In today's era, girls are progressing in all fields even in the fields which were dominated by Male ssociety some times ago. Girls have recognized their energy, talent & hidden qualities, hence due which they are getting respect & regard, very soon they will have their dominance on Male society as this is era of women power & final decision goes in their favour.
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