कलम🖋

एक लंबे अरसे बाद फिर आईं 

      आख़िर मैं फिर से ख़ुद को ढूँढ लायी

 नई क़लम ,नई डायरी ,नया दिन ,

      ज़िंदगी के पन्नों को फिर समेट लायी ।।


मेरी क़लम ने साथ मेरा दिया है आज 

      मन के विचारों को दिया है नया एहसास

 पुराने पन्नों ने बदला हुआ रंग दिखाया है

        फिर भी गुनगुनाते शब्दों ने नवविश्वास जगाया है ।।


आज बेझिझक चलना चाह रही है मेरी क़लम

       सोच रही है सलाखों में बहुत रातें काटीं हैं 

कुछ ख़ुशनुमा सा हो गया है मौसम भी

        बादलों ने आसमा संग -थोड़ी धूप भी बाँटी है।।

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