ठहरा पानी

ठहरा पानी तालाब का, गहरा कीचड़ बनने लगा ,

निकल आए किनारे ऊपर, नीचे सब पत्तों से ढक गया ।

खिलते जा रहे है कमल के फूल ज़ोर-शोर से

खुश हो जाता दिल अब, सब मनमोहक बन गया ।

             बचते हुए निकलते थे, जिसको बिना देखे,

              आज आँखों को सुहाने लगा है ।

              रुक रही है नज़रें बार-बार देखने को,

              अब जन्नत सा एहसास करवा रहा है ।

धीरे-धीरे चलती हवा से लहरा रहे हैं मतवाले से,

बदल गई हैं तस्वीर ,वजह बन गए मुस्कुराने की ।

झुम रहे हैं फूल पत्तों को फैलाकर तालाब में,

अब तो पहचान, बन ही गई “ठहरे पानी”की ।।

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