रंग

‘होली’शब्द सुनते ही  नाचने लगते हैं इंद्रधनुष से रंग 

ना कोई गोरा काला ,सब एक जैसे ही  रंगों में लथपथ ।

होली के दिन तो हवा भी निराली ही बहने लगती है

 बच्चों से लेकर बड़ों तक को  रंगीली दुनिया में ले जाती है ।


उड़ा रहा है गुलाल  चल रही रंगों भरी पिचकारियाँ 

 रंगों में सरोबार होकर ज़ोर-शोर से खेल रहे 

बज रहा हैं संगीत ,नाच -गा रही है टोलियाँ ।


बहुतों की होली के रंग ही फीके है 

ना रंगों का झरोखा ही दिख रहा घर में ।

 रंग-बिरंगे  रंगों का एहसास ही नहीं आज उनको

ख़ामोशियों का भंडार बना हुआ है आंगन में ।


परिवार की ख़ुशी में ख़ुश तो दुःखों में दुःखी हैं 

हाथ जोड़कर  “दुआ”खुदा से कर रहे ,

देना ख़ुशियाँ सबको  झोली भर-भर के 

हमें भी रंगों से नहलाना  अगली होली में 

आंगन को लाल गुलाबी रंग से भर देना अगली होली में ।।

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