भूल जाते हैं सब
कच्चा रास्ता और धूल-मिट्टी , बस -
नहीं दिख रही, पक्की सड़क भी अब तो ।
वो रौनक़, वो खेलते बच्चों का शोर
छूट गया कहीं, बहुत ही पीछे ।
एक मन -
उस भीड़ में घुल-मिल जाऊँ जाके
‘दूजा मन’ दूर ही बैठा रहूंगा ,अब उन सबसे ,
नहीं सोच पा रहा है दिल , करना क्या है ?
तन्हाई में अकेले-
या फिर सबकी ख़ुशियों में खुश रहूँ मिलकर ,
‘बना ली ख़ुद ही’, बड़ी दुविधा ये तो
बार-बार सोच रहा मन ये सब, विचलित होकर ।
चलो “भूल जाते हैं सब”,
बदल लें थोड़ा ख़ुद को,‘बिना खोले अतीत’ के दरवाज़े,
जायेंगीं कहाँ आ ही जायेंगीं, एक दिन
भूलीं-भटकीं ख़ुशियाँ भी, ढूँढते हुए हमें,
हमारे पीछे-पीछे ।।
Well described
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