अब उंगली की बारी तुम्हारी

                    बहुत समय हो गया वापिस आए हुए ।  पर “ऐसा लगता है, जैसे  अब भी वहीं पर ही है” ।   सब दिनचर्या   ऐसे ही चल रही है । 

   वक़्त तो बहुत जल्दी बीत गया । पता ही नहीं चला । “लेकिन यह यात्रा यादगार बन गई” ।

       सुबह होते ही “नमस्ते” से दिन की शुरुआत । 

           “फिर दुबारा  दवाइयाँ याद दिलाना ” ।   फिर दोनों के स्वास्थ्य का पता करना ।

    आप भी सोच रहे होंगे , “किसके लिए इतनी चिंता हो रही है” ।   

      जिसको हर चीज़ ऐसे याद  करवाई गई । 

     “पहले ख़ुद  याद करना” और फिर उनको याद करवाना ।

              कुछ तो समय की अनियमितता , देश के हिसाब से। वहाँ दिन तो अपने देश में रात । सब कुछ उलझ गया था ।

     “ख़ासकर उनके लिए तो” ।

              ढलते दिन का तो पता ही नहीं चल रहा था । वहाँ तो  अँधेरा भी देर रात ही  हो रहा था । 

   “उनको तो सोने के लिए भी टाइम देखना पड़ रहा था” । 

         लग रहा था जैसे हम बड़े हो गए और  “वह बच्चे बन गए हैं “।  समय इतना धीरे-धीरे चल कर भी  भी बहुत आगे निकल गया शायद । 

            माप-तोल कर खाने को देने की कोशिश में कभी -कभी लगता था । दे ही देते हैं  ।  

     “उनको मनपसंद खूब खाने दिया जाए” ।

     रोकते नहीं, बाद में देखा जाएगा ।  

     “पर शरीर भी तो स्वस्थ रखना था ।  हमें  ही उनको संभालना था । 

      “कभी कभी नाराज़ भी हो जाते थे कि  बच्चों के जैसे डाँट रहे हो । “एक समय तो सच में लग ही रहा था, जैसे बच्चों को ही संभाल रहे हैं” ।

       कुछ मनपसंद खिलाकर,  “पुरानी बातें याद करते” । हँसी मज़ाक़ करते । समय का पता ही नहीं चलता ।

        हमारे साथ बाहर भी खाना खा लेते थे दोनों ।  “वो भी ख़ुशी-ख़ुशी” । 

      याद आया ,एक बार यूँ ही टहलते हुए चाय पीने के लिए गए हम सब मिलकर ।

    “ वह नहीं चाहते थे कि हम उनको हाथ पकड़कर चलाये ” ।

              उनका ख़ुद ही चलने का मन था । “पर यातायात इतना ज़्यादा था”  कि सड़क पर चलते हुए हाथ पकड़ना ही पड़ता ।

     ताकि जल्दी सड़क पार कर ,दूसरी तरफ़ पहुँच जाए ।

      बड़े ही जतन से समझाया । “बात घुमा-घुमाकर” ।

                मैंने बोला—  याद करो ‘पापा’ ।  “जब आप  ऊँगली पकड़वाकर हमें सड़क पार करवाते थे” । गाड़ियों से बचा -बचाकर निकाल ले जाते थे ।

    हम भी आपकी बात मानते थे ना । 

         अब उंगली की बारी मेरी है । “आप को सुरक्षित घर भी ले जाना है” । 

       यह सब सुनकर बड़ी सी मुस्कान आयी उनके चेहरे पर । 

            थोड़ी देर हँसते ही रहे । “फिर अपना हाथ आगे कर दिया , पकड़ने के लिए” ।

    हँसते हुए बोले — हाँ   “अब उंगली  की बारी तुम्हारी”   ।।

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