कुछ ही पलों में


                   अनुराग ऑफिस से घर आते ही अपने कमरे में चला जाता था ।    जब भी सुधा  चाय-पानी पूछने जाती ,तो सोने की कोशिश करने लगता ।

    जैसे न कुछ सुनना ,न ही कुछ बताना । 

                “अपने बेटे का यह रवैया उससे सहन नहीं हो रहा था” । बहुत दिन ऐसे ही निकल गए ।

       “ लेकिन बेटे के कमरे में जाना नहीं छोड़ा सुधा ने ” । एक बार तो ज़रूर कोशिश करती बात करने की । 

               “जब भी माँ कमरे से बाहर जाती , आँखों में पानी के लिए बैठ जाता था” ।  उनसे बात करने की हिम्मत ही नहीं थी । 

        “ कैसे बताए कि वह तो किसी ऑफ़िस में  जाता ही नहीं” ।  इस समय उसके पास कोई नौकरी वग़ैरह नहीं है ।

          ” घर से तैयार होकर खाना लेकर जाता ज़रूर  है”  ताकि माँ को दुख न हो ।  लेकिन लिफ़ाफ़े बनाने वाली फ़ैक्ट्री में । 

     “जहाँ वह साल भर से मज़दूरों के बीच काम कर रहा है” ।

                  बहुत बार सब कुछ धीरे -धीरे  दिमाग़ में घूमने लगता । कैसे ‘ऑफ़िस के एक कर्मचारी ने छेड़-छाड़ का आरोप लगाकर ऑफ़िस से निकलवा दिया था’ । 

     और ‘कुछ ही पलों में सब कुछ ही बदल गया था” ।

     जो काम उसने किया ही नहीं ,उसकी सज़ा वह सालभर से काट रहा था ।

              कम्पनी से हटाए जाने के बाद, बहुत कोशिश की पर कहीं काम नहीं मिला । “सब यही पूछते —पहली जगह काम क्यों छोड़ दिया” ।

        पर सोच लिया था घबराना तो बिलकुल नहीं ।”चाहें हालात कैसे भी हो जाए” । 

   घर पर ख़ाली भी नहीं बैठ सकता । मेरे साथ-साथ माँ भी परेशान रहेंगी मुझे देखकर । 

             दो-तीन महीने धक्के खाने के बाद लिफ़ाफ़ा फ़ैक्ट्री में काम मिल गया । उन्होने ज़्यादा पूछताछ भी नहीं की । 

          घर में भी किसी को कुछ पता नहीं चला । “वैसे भी घर में लोग ही कितने थे , अनुराग और उसकी माँ   बस” ।

                  एक दिन फै़क्टरी मालिक ने बुलाया और एक लेटर हाथ में पकड़ा दिया ।  “वह डर गया , कहीं ये भी हटा तो नहीं देंगे” ।  

   अंदर तक कांप गया । “अब क्या करूँगा , कहाँ काम ढूँढूँगा फिर से” ।

               बाँस ने बोला—  खोलो इसको । डरते डरते  खोलना शुरू किया । हज़ारों तूफ़ान एक साथ ही दिमाग़ में चलने लगे । 

       “माँ का सवाल करता हुआ उदास चेहरा दिखने लगा” ।

                ज्यों ही, डरते हुए कंपकंपाते  हाथों से लेटर खोला ।  “पढ़ते ही ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा ,उसको फ़ैक्ट्री का मैनेजर जो बना दिया था” ।

      उसकी पढ़ाई-लिखाई और उसका व्यवहार देखकर उसकी तरक़्क़ी कर दी थी ।

              “वहीं बैठकर ख़ुशी से रोने लगा” । बाँस  ने  उठाकर गले लगाया । और बोले— “तुम इसी के लायक थे” । 

      बस मैं तो तुम्हें परख रहा था ।

    “उसने उठकर  उनके पैर छू लिए , दोनों हाथ जोड़कर धन्यवाद भी किया” ।

                बाँस के वहाँ से जाते , “पागलों की तरह कभी हँस रहा था तो,  कभी ख़ुशी में रो रहा था” । आख़िर भगवान ने साथ दे  ही दिया ।

       “उस पल का धन्यवाद किया” , जब फ़ैक्ट्री में काम पकड़ा था । 

          आज तो सीधा माँ के पास ही  जाऊँगा , अपने कमरे में भी बाद में  । उनके लिए तोहफ़ा, मिठाइयाँ सब लेके जाऊँगा ।

                “मेरे साथ उन्होंने भी एक साल बहुत दुःखी रहकर काटा है “। 

                 स्कूटर को भी जल्दी-जल्दी मोड़ा । पहले मिठाई वाली दुकान पर रोका । “माँ की मनपसंद मिठाई ली” ।  फिर घर की तरफ़ स्कूटर भगा ली  ।   

     “घर का रास्ता आज कुछ ज़्यादा ही लंबा हो गया ” ।

                  लग रहा था जैसे   “स्कूटर के साथ साथ चलने वाली हवाएँ भी  ख़ुश है, उसके लिए ”।  सब कुछ बदल गया “कुछ  ही पलों मे”   ॥

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