बचते-बचाते हुए

                     आज सब इनसे बचकर निकल रहे थे , कभी बात ना करनी पड़ जाए । “ जब भी किसी को आता दिखता , तो सब वहाँ से सरकने की कोशिश करते” । 

                   कहाँ गया ? उनका वो वक़्त ,रुतबा । “जब  गाड़ी से उतरता था तो   सब भागकर खिड़की खोलते थे” । उसका खूब आदर सत्कार करते  । 

   “एक से बढ़कर एक आगे जा-जाकर गले मिलते” ।

     आज हालात ये थे कि “कोई अपनी कुर्सी भी नहीं देना चाहता था उसे बैठने के लिए” । 

                     ऐसा क्या हुआ होगा जो इनका व्यवहार इतना बदल गया । सोचे जा रहे थे हम  उन सब को देखकर । 

   “एक समय था जब हमने इन्हें अपना आदर्श बनाने का सोचा था” ।

               तभी किसी ने हमारा नाम लिया —कैसे हो ?  “ज्यों ही हमने मुड़कर देखा तो वही भाईसाहब पीछे खड़े हुए थे” । 

    “अब औरों  की तरह  भागे भी तो कहाँ और क्यों” ? 

      हम से तो कोई उंच-नीच नहीं की  उन्होंने कभी । 

                    हाथ मिला अभिवादन करके हाल-चाल पूछा । “उन्होंने तो बच्चे, नौकरी, परिवार वग़ैरह सब एक ही साँस में पूछ लिया” ।    

     फिर अपना भी बता दिया बिना पूछे ही ।

                      बात चलती- चलती घर की लोकेशन और पैसे पर आ गई । “बाद में आने की  कहने की बजाय ,  साथ ही चलते हैं आज ही — बोलकर मुस्कराने लगे” ।

     हम जो भी बात कहते वह उसको  अपने हिसाब से मोड़ कर घुमा लेते । 

      “अच्छा जी —चलते हैं अब औरों से भी मिल लेते हैं , फिर आकर  आपको मिलता हूँ थोड़ी देर में” ।

                    यह कहकर  चलने की कोशिश करने ही लगे थे “तभी बोलते —14/15  हज़ार रूपये पड़े हैं क्या ?  देना । अभी आपको पेटीएम कर दूँगा” । 

       नहीं तो आपके फ़ोन पर भेज दूँगा । 

      “मुझे यहाँ लेनादेना करना है । कैश  नहीं है  मेरे पास” । 

                          अब , सबका उससे दूर सरकने का कारण समझ में आने लगा । “उंगली पकड़कर पोचा पकड़ने वाला इंसान ही लगने लगा थोड़ी देर में ही” ।

                     “उसी समय  किसी रिश्तेदार ने मेरे हालात देखकर आवाज़ लगा दी” । उसके पास से दूर करने के लिए । “यूँ कह सकते हैं उससे बचाने के लिए” । 

     फिर तो उनके पास जाते उसकी पूरी कुंडली ही पता चल गई । 

                         “उसका चरित्र  और व्यवहार , सब में दस क़दम ऊपर ही निकले” । दोनों पति पत्नी अकेले ही खड़े थे पूरे समारोह में । 

         “हम उनकी जो पहचान आजतक  मन में बिठाकर चल रहे थे ,  वह अब  मिटती जा रही थी”।  

                       जो हमेशा से उनके लिए दिल में इज्ज़त होती थी “उनके कर्मों का चिट्ठा सुन-सुनकर बिलकुल ख़त्म ही हो गई”।

      अच्छे-बुरे कर्म लौटकर आते ही है । वह आज अपनी आँखों से देखा और महसूस भी किया  । 

       “कैसे लोग उससे  बचते-बचाते हुए भाग रहे थे” । 

                      और सब अपने-अपने अनुभव साँझा कर रहे थे कि उनके साथ इसने क्या -क्या किया ।    मैं खड़ा-खड़ा अपने भगवान को धन्यवाद भी कर रहा था । 

    “हमें सही समय पर रास्ता दिखाने के लिए” । 

                     नहीं तो शायद आज हम अपने  पैसे उसको दे चुके होते  उनके बहकावे में आकर । “उसको आज ही अपने घर ले जाते अच्छे रिश्तेदार की तरह”।

    “हमारी तरह पता नहीं  कितने लोगों ने ही उन्हें अपना आदर्श बनाने की सोची होगी”  ?

               और आज हम भी उनका सच जानने के बाद उनसे “बचते-बचाते हुए ” ,  बिना बताए चुपचाप समारोहों से घर लौट रहे थे ।।


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