किताब का पेज

                

               आज मेरे दिलों दिमाग़ और मेरी किताब के पेज पर शायद उसकी बातें साँझा करना ही  लिखा है । 

    “ रीवा’    हाँ रीवा नाम ही है उसका “।

                  रीवा पहले तो अपने आपको अंदर ही अंदर समेटकर रखती थी हमेशा । “यह भी कह सकते है कि अपना मर्ज़ किसी को दिखने नहीं देती थी” ।

                    दिखाती तो ऐसे,  जैसे सब पूर्णतः से ठीक चल रहा है । परिवार में सब कुछ बहुत अच्छा है ।

  “चेहरे तक  भाव तो  आने ही नहीं देती थी” ।

                 चार-पाँच साल लग गए उसको यहाँ तक पहुँचने में । वह तो शक्ल से ही बीमार लगने लगी थी” ।

      “ज़्यादातर लोग टोकते ही रहते थे अक्सर — सब ठीक है क्या” ?  । और वह   बस सिर हिला देती  । 

                     हाँ जी  सब बढ़िया है । “अपनी बेटी को अच्छी परवरिश देना ही अपनी ज़िंदगी का  मक़सद बना लिया था अब तो”।

                     अभी  कल ही की तो बात है । सबसे ज़्यादा  रीवा  ही चहक रही थी । “वही हँसी ठिठोली ,   दोस्तों के साथ छेड़-छाड़ करती रही” । 

   इन छोटी-छोटी बातों से ही खिलखिलाती रही थी ।

                      “भरपूर एनर्जी रहती हैं अब तो” । ख़ुद ही खुलकर अपनी ज़िंदगी का बताती रहती हैं । क्या , कैसे चल रहा है ।

       “और बताती हैं तो मुस्कुरा कर , चेहरे पर शिकन तक नहीं आने देती” ।

                       रीवा को पहले उम्र का बहुत रहता था । वह 40 की है लगती तो नहीं । , वह 45 की है फिर भी 60 की दिखती है । 

     यही बातें करती रहती थी ।

   “ खुद  को भी उम्र से  छोटी सोच कर चलती थी” । 

                   यही नहीं कि उनके बच्चे बड़े है  तो आंटी हुई । उनके बच्चों की शादी हो गयी तो आंटी हुई । अभी उसके बच्चे  थोड़े छोटे हैं तो दीदी हुई ।

      “इन्हीं बातों में उलझी रहती थी” ।

                           “चुलबुली सी बच्चों के जैसे कूद-फाँद करती रहती” ।  कोई भी त्योहार हो तो  सबसे आगे खड़ी मिलती । 

                       “पति का घर छोड़ने से लेकर ,तलाक़ होने तक ,बहुत ही बुरा वक़्त काटा है इसने” ।   अब तो वक़्त से लड़कर  आगे निकल आईं । 

      अपने बारे में सोचने लगी । 

      “दिन निकालने नहीं ,बिताने नहीं ,  बल्कि खुलकर जीने है मंत्र रट लिया शायद” । 

                   अब वह नज़र चुराकर नहीं निकलती बल्कि रुककर बात करती है  । “अपने अंदर के तूफ़ान को दबाकर खड़ी हो गई शायद  वह अब” ।

                      वैसे तो ज़्यादातर को उसके जीवन का सारा सच पता ही था । “बस सब  चुपचाप बातें करते रहते थे” ।             

     उसको आते देखकर सब को  नये विषय पर बात करने का मुद्दा मिल जाता था । 

                उस को देख सब ख़ुश होते है । “बुझी हुई ,मुरझाई सी रहने वाली रीवा  अब फूल  जैसी खिल सी गई है”।

           सबसे  अपनी बातें शेयर करती है । “बल्कि वह तो हमारे लिए भी शिक्षिका बन गई अब तो” 

                     “अपने बुरे दिनों को याद करके मत बैठो और आगे बढ़ जाओ” । जितना  सुधार सकते हो जीवन को उतना तो सुधार लो । 

     “ रोने धोने से कुछ नहीं होता अपनी ज़िंदगी ख़ुद संभालनी ही पड़ती है” । 

                          ऐसे ही बहुत सारी सलाह देते रहती है  । “उसकी बदलती  सँवरती ज़िंदगी  एक  “किताब का पेज” बन गया अब तो” ।

      उसी  किताब के पेज से सबको ज़िंदगी के लिए बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है   ।।


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