बचपन का एहसास
जो मैंने महसूस किया व आपके साथ भी साझा कर रही हूँ ।
“ मंत्रों का ज़ोर-शोर से उच्चारण जो बिना माइक के भी सारे वातावरण को गुंजा रहा था” । घर के बाहर खड़े होकर भी बहुत अच्छा लग रहा था ।
“वह लय में गूँजते हुए शब्द मेरे लिए किसी जादू की झप्पी से कम नहीं थे” ।
“नहीं रोक पाई ख़ुद को , जल्दी-जल्दी अपने काम ख़त्म किए” । और नहा-धोकर पूजा के प्रांगण में पहुँच गई ।
अंदर कदम रखते ही सात्विक एहसास होने लगा । सबके साथ अंदर जाकर बैठ गये ।
हालाँकि मेरे जान-पहचान के कोई भी शख़्स नहीं दिख रहे थे ।आपको भी पता ही होगा “ ज़्यादातर प्रसाद मिलने के समय ही आते हैं”।
सब सुव्यवस्थित था । “फिर तो एक घंटा कैसे बीता , पता ही नहीं चला” ।
सभी आचार्यों ने मिलकर एक साथ मंत्रोच्चारण को जारी रखा । “वह भी संस्कृत भाषा में” ।
“जिनमें से कुछ तो समझ आ रहे थे । लेकिन जो समझ नहीं आये , उनके भाव पूजा के हिसाब से दिमाग़ में आ रहे थे” ।
जो भी वहाँ यजमान थे, आचार्य जी के कहे अनुसार पूजा कर रहे थे । जैसे -जैसे उनको आचार्य जी बोल रहे थे ।
उन्हें निर्देश दे रहे थे उसी हिसाब से करते जा रहे थे ।
हम इतना तल्लीन हो गए थे पूजा के उस वातावरण में । “माइक बंद होने के बाद ही एहसास हुआ , कि हवन का समापन भी हो गया है” ।
सब ख़त्म होने के बाद बहुत सारे लोगों से मिलना भी हुआ । जिनसे साल-भर से नहीं मिले थे ।
हम सब एक ऐसी जगह थे । जहाँ बस सुनना है और महसूस करना है । “इधर-उधर की बातों की कोई जगह नहीं थी” ।
महसूस भी किया , उस ऊर्जा को जो वहाँ के वातावरण में फैली हुई थी ।
“मुझे सकारात्मकता के अलावा और कुछ महसूस नहीं हो रहा था” ।
“ पूरे रास्ते क्या , घर लौटने के बाद भी , मुझे वहाँ की शुद्ध सकारात्मकता महसूस होती रही” । रात सोने से पहले ख़ुद को ही धन्यवाद किया ।
“अगर मैं ख़ुद को जाने के लिए तैयार नहीं करती तो शायद मन में ही रह जाता” ।
उन मंत्रोच्चारणो का लय के साथ उच्चारण दिमाग़ में बैठ गया । “मेरे हिसाब से किसी भी संगम का आनंद लेना है तो उसी माहौल में रमणा पड़ेगा” ।
तभी महसूस होगा कि आप वहाँ वास्तव मे उपस्थित हो ।
“सबसे बड़ी बात एक यह भी थी कि वहाँ पर कोई भी इधर उधर नहीं झांक रहा था” । कोई भी बात नहीं कर पा रहा था ।
सब का ध्यान बस आचार्यों के द्वारा हो रहे हवन ,पूजा और वह जो भी निर्देश दे रहे थे ,उसको करने पर था ।
“बहुत दिनों तक सोचती रही कि मैं अब भी वहीं सबके बीच में बैठकर सुन रही हूँ” ।
“मेरे बचपन के दिनों की यादों में था यह एहसास” । जो आज फिर से महसूस हुआ ।
“मेरे बचपन का एहसास” फिर से अब यह यादों में रहेगा ।
शायद आप में से भी कोई , फिर से अपनी यादों को ताज़ा करना चाहता होगा ।
“लेकिन यादें शायद अलग-अलग होंगी” ॥
You are a great writer
ReplyDeleteGreat 👍 पढ़ कर भी उसी माहौल का एहसास हुआ 👍👏🙏
ReplyDeleteBeautifull & keen observation 👌
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