घूरतीं आँखें

 मटमैले कपड़े फिर भी चेहरे पर हँसी,

हाथ में कपड़ा कार साफ़ करता हुआ,

 दूसरे हाथ से माँगने का इशारा कर रहा ,

घूरती ही रही वो बेबस दिखती आँखें ,बहुत दूर तक ।

          आँखों का सूनापन हँसी को कर रहा था धुँधला,

           क़ाफ़िला वाहनों का रुकते ,आ रहा था ख़ुशी से झूमता 

                बेबस था पर बेबसी छलकने नहीं दे रहा ,

                 कार साफ़ करने का मेहनताना भी माँग रहा ।

              कोई पैसा दे रहा तो कोई सामान भी पकड़ा रहा,

              तरस खाकर दे रहे कोई मज़दूरी समझ कर दे रहा ।


                 विचलित हो रहा है मन ,रौंद ना जाए कोई ,

                 ढूँढ रही है नज़रें, भागते हुए को इधर उधर ।

                  घूरतीं ही रहीं वे बेबस दिखती आँखें ,

                                 बहुत दूर तक ।।

Comments

  1. आपकी इन पंक्तियों को पढ़कर ऐसा लग रहा है जैसे मैं भी उसको महसूस कर सकती हूं और देख सकती हूं जिसको आपने अपनी कविता में व्यक्त किया है

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