सुबह

                         अध्याय - 4


वह रात होने तक पति का इंतज़ार करती रही। फिर बच्चों को सुला कर दरवाज़े पर खड़ी हो गई। गली में आते जाते लोगों को देखने लगी, तभी एक स्कूटर उसके घर के आगे रुका। एक लड़का उतर कर आया और उसके पति की मृत्यु का समाचार सुनाकर चला गया। वह तो जैसे सुनते ही पत्थर की बन गई ,उसकी आँखों के आगे सिवाय अन्धेरे के अब कुछ नहीं था। वह उसी भगवान से पूछ रही थी, जिसको उसने बार -बार  हर पल धन्यवाद किया था, “हे भगवान”  तूने ये क्या किया इतनी सारी ख़ुशियाँ भी दी और सभी को एक झटके में ही छीन लिया। वह दो दिन तक रोती रही पर अब उसे बच्चों के लिए जीना था ।

            उसने अपने आप को अन्दर से मज़बूत किया और हौसले के साथ बच्चों को संभाला। और फिर उसे अपने पति के स्थान पर नौकरी भी मिल गई। घर का ख़र्चा वह आराम से चला लेती थी ।,परंतु उसकी आँखे अब भी तलाशती रहती थी, काश‌‌! उसका रमेश वापस आ जाए। पर भगवान की मर्ज़ी के आगे किसकी चलती है। वह अब भी भगवान पर भरोसा किये हुई थी।कोई चमत्कार ही हो जाए ।

         अचानक ही वह यादों से बाहर निकली, तो देखा रात के 11 बज चुके थे। अपनी आँखों से आँसू पोंछ कर सोने की कोशिश करने लगी ,क्योंकि सुबह उठकर अपने काम पर जो जाना था ।अपने बच्चों के भविष्य को सँवारना था । अगली सुबह की दिनचर्या सोचते सोचते, उसकी आँख कब  लग गई, उसे पता ही नहीं चला । 

                            

                            समाप्त

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