“उम्मीद “
कुछ मायूस लग रहे है ,बाट जोहते हुए मज़दूर ,
देख रहें है लगायेगा कोई आवाज़ ,
सुनना चाह रहे है “आ जाओ “ मिल रहा है काम,
तलाशती नज़रें लग रही हैं ,बेबस और लाचार ।
टोकरी ,कस्सी , सिर पर रखे चले जा रहे ,
मेहनत करके ही खाना है ,ये प्रण लिए हुए,
खड़े मज़दूरों की भीड़ में, आने -जाने वालों को निहारते , आयेंगी आवाज़ कहीं से तो ,विश्वास लिए हुए ।
स्वाभिमान और ख़ुद्दारी तो खुदा ने है दिए ,
माँगकर नहीं खाना है क़सम ये भी लिए हुए ,
खोखली होती हुई “उम्मीदों “को पकड़ा है कसके ,
भरोसा नसीब पर भी, बढ़े जा रहे महेनत करने के लिए ।।
Down to earth poetry, amazing
ReplyDeleteKya bat ek laber k dil ki avaj 👍
ReplyDeleteVery nice poetry and hard work is foremost than luck.
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