“उम्मीद “

कुछ मायूस लग रहे है ,बाट जोहते हुए मज़दूर ,

देख रहें है लगायेगा कोई आवाज़ ,

सुनना चाह रहे है “आ जाओ “ मिल रहा है काम,

तलाशती नज़रें लग रही हैं ,बेबस और लाचार ।

टोकरी ,कस्सी , सिर पर रखे चले जा रहे ,

मेहनत करके ही खाना है ,ये प्रण लिए हुए,

खड़े  मज़दूरों की भीड़ में, आने -जाने वालों को निहारते ,                                                                                 आयेंगी आवाज़ कहीं से तो ,विश्वास लिए हुए ।

  स्वाभिमान और ख़ुद्दारी तो खुदा ने है दिए ,

 माँगकर नहीं खाना है क़सम ये भी लिए हुए ,

 खोखली होती हुई  “उम्मीदों “को पकड़ा है कसके ,

 भरोसा नसीब पर भी, बढ़े जा रहे महेनत करने के लिए ।।

Comments

Post a Comment

Popular posts from this blog

दहलीज़

हैप्पी लास्ट दिन

घर के दरवाज़े