परिंदे
पसरे हुए कहोरे में सुस्ताते हुए वृक्ष ,
सनसनाती हवा से जाग ही पड़ते हैं ।
किरणें फ़ैल रही है सूर्य की इस जहाँ में ,
चहचहाते परिंदे भी घोंसले छोड़ उड़ान भरते हैं ।।
परिंदों ने आज शायद सूरज को भी उठाया है,
रोशन कर दो इस जहाँ को ख़ूब शोर मचाया है।
आज आँख-मिचौली नहीं चलेगी तुम्हारी ,
झुम के पेडों ने भी सिर हिलाया है ।।
आएँ हैं बहुत परिंदे आज मेरी मुँडेर पर भी ,
मौजूदगी दर्ज करवाई है आवाज़े लगा मोर ने भी ।
चमकती धूप ने पानी में चाँदी सी किरण फैलायी है,
शाखाएं भी परछाई को देख पहुत मुस्कराई है ।।
It's great,aap bahut acha likhti ho beh, realistic
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