विश्वास

 लोग कहते हैं मन दुखी हो ,तो ही लिखता है ,

 जिसको ज़माने ने तंग किया ,वहीं बयाँ करता है ,

  नया दिन नयी सुबह निकलने से लेकर रात तक,

       सब शब्दों की माला में पिरोकर देता है।।


 इंद्रधनुष के रंगों सी ज़िंदगी,

    सुख -दुख के चक्कर में छूट जाती है ।

मोतियों की माला की तरह ,

      जाने -अनजाने में बिखर जाती है ।

करके कोशिश ,बटोर के मोतियों को ,

    फिर माला बनके फूलों सी महक जाती है ।


मैंने ही नहीं मेरी सोच ने भी पैर पसारे हैं ,

     विचारों की दिशा बदलकर ढूँढे नए नज़ारे हैं ।

इतनी भी बुरी नहीं है ये हमारी ज़िंदगी,

      मकड़ी के जाले हटाकर सँवारी फिर दिवारे है ।

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