दूसरी दुनिया

          अध्याय ३


       बिमला का जन्म होते ही उसके “सगे माता-पिता” ने उसे ‘किन्नरों” के हवाले कर दिया था। बच्चे के पैदा होने की ख़ुशी मातम में बदल चुकी थी  और घर में सिवाय चुप्पी के कुछ भी नहीं था ।”माँ “ रोयी भी होगी या नहीं ,ये भी नहीं पता । जिसने ‘नौ’ महीने अपने ‘खून से सींचा’ क्या वो पल-भर में भूल गई होगी। आख़िर थी तो उसकी औलाद ही। 

                 जी हाँ , जिनको पूरा शहर “बुआ” कहता था वो एक किन्नर थी। हाथों की लकीरों में ‘तक़दीर’ बदल गई थी । उसका नाम “बिमला” उसके माँ बाप ने नहीं दिया था ।वो नाम भी उसको “किन्नर समुदाय” ने ही दिया था  वो बेघर हो चुकी थी । ना ही  रिश्ते बचें थे, ना वो दुनिया । ना ही उसका बचपन सरल था, ना ही जवानी और बुढ़ापा तो बदहाल ही हो रहा था । मुझे नहीं समझ आया कभी ,उनसे बचना  क्यों है । 

               जब भी गली में मिलती  हम  ‘नमस्ते’ करते। “बुआ नमस्ते”  ये सुनकर उनकी आँखों की ख़ुशी हमने महसूस भी की हुई है ।  संभलकर जाना ,जीते रहो ,ये शब्द आज भी कानों में गूँजते हैं । सब की “बद्दुआएँ” लेकर भी सबको दुआएँ ही देती रहती थी ।

           उनकी गली के पास से हर रोज़ ही आना-जाना होता था ।गली में मोड़ आने तक नज़र उनके घर की तरफ़ जाती रहती थी । एक ‘अफ़वाह’ फैला रखी थी लोगों ने, उनसे दूर रहा करो ।ये तुम्हें भी अपने जैसा बना देंगे। घर पर भी बार- बार बात दोहराई जाती थी कि उनकी दूसरी दुनिया है  हम जैसे नहीं  ।गली में दिखें तो भी दिशा बदल लो । उनको टोकना नहीं है ,नहीं तो “उल्टा-सीधा” कुछ भी बोल देंगे  और भी पता नहीं क्या-क्या ।हम बच्चे भी उनसे ऐसे बच-बच के निकलते थे, जैसे हमें  एक हाथ से ही उठा कर ले जाएंगे । To be continued……,,,,

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